प्रकृति और मनुष्य

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🖋️ राघव सांकृत्यायन खगड़िया


विविध विज्ञगण से जाना मैंने,

मानव तुम अति बलशाली हो।

क्या बात हो रही है मार्श पर,

करते निशाकर की रखवाली हो।


सबसे अव्वल आप जीव जगत में,

विविध ज्ञान और समझदार

फिर भी आपने इसे जाना क्यों नहीं,

प्रकृति स्रोत है सकल सुख नाना, 

फिर भी क्यों करते खिलवाड़ प्रकृति से,

जिससे यह धरा रसातल जाने वाली है।



आज यक्ष प्रश्न अब आन पड़ा है,

सारा जगत अब निष्प्राण खड़ा है,

कैसे  लौटेंगे बहुरंग अब प्रकृति में,

क्यों ज्ञान और विज्ञान निर्मित है।

ऐ मानव, तुझे देख मुझे यूं लगता है,,

जैसे नभ अब अंगार उगलने वाली है।

फिर आप कैसे कहते हैं कि यह मानव है,

तुम करते हो प्रकृति की रखवाली हो।

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