व्यथा
चारों ओर से आ रही है पुकार,
मृत्यु कर रही है तांडव घर द्वार,
सुनी सड़क और गली बाजार,
लगता है कि शमशानों में हरनों का अंबर।
टूट रहे हैं नयनों के सुंदर सपने,
पल में कर्ता हो रहे हैं सब अपने,
लगा सारांश अब चिता से तप कर रहा है,
नास्तिक लगे अब राम नाम जपिंग।
चिल्लपों और चित्कार निराशा,
कैसे बचेंगे जन जीवन आशा,
कैसे प्रकृति ने खिलकी है पासा,
जीव हृदय से मिट रहा प्रकाशा।
दीनों के लिए यह रात घनेरी,
भई गति सांप छूछूंदर केरी,
भूख से आंतें कुलबुल है मेरी
त बाहर मौत राह तेक तेरी।
अपनी व्यथा मैं व्को सुनाऊं,
बच्चों का निवाला I कहां से लाऊं,
झूठे वादों को अब मैं कैसे खेलूँ,
क्या हे मृत्यु अब तुम्हारे पास पर आ जाऊं।
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