लोकतंत्र का मजदूर
मेरे चेहरे पर नहीं आता है कभी नूर,
रहता हूं हरदम मैं तेरी दुनिया से दूर,
बीबी बच्चों की खुशी को रहता हूं मजबूर,
हां,साहब मैं हूं इस लोकतंत्र का मजदूर।
तेरा और मेरा अलग अलग है रास्ता,
तुझे चाहिए मोटे गद्दे और मेरा मेहनत से वास्ता,
मैं खुश रहता हूं खाकर सुखी सी रोटी,
तुम्हें मुबारक हो बटर,चीज और फल का नाश्ता।
हमें निसबत है इन सारी चीजों से हूजूर,
हां साहब मैं हूं इस लोकतंत्र का मजदूर।
मुझे कभी नहीं सताते ठंड , वर्षा और धूप,
नहीं कभी सराह सकूं अपनी प्रिया का रुप,
उत्सव होता है मेरे घर आंगन में उस दिन,
जिस दिन हरा देता हूं रिपू क्षुधा स्वरुप।
अपनी बुलंद नसीबों पर होता हूं मैं मगरुर,
हां साहब, मैं हूं इस लोकतंत्र का मजदूर।
मेरी इस दीन दशा पर साहब क्यों मुस्काते हो,
मेरे ही अथक परिश्रम से तुम सारे सुख पाते हो,
देते हैं तुम्हें सारे भौतिक सुख हम अपना , जे
इसे स्वयं की चालाकी और हमें मुर्ख बताते हो।
अब लगता है तोड़ना चाहिए साहब तेरे सभी गुरुर,
हां साहब,मैं हूं इस लोकतंत्र का छोटा सा मजदूर।
हां साहब, मैं हूं इस लोकतंत्र का मजदूर।।
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