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 प्रकृति और मनुष्य       ----------------------------- 🖋️ राघव सांकृत्यायन खगड़िया विविध विज्ञगण से जाना मैंने, मानव तुम अति बलशाली हो। क्या बात हो रही है मार्श पर, करते निशाकर की रखवाली हो। सबसे अव्वल आप जीव जगत में, विविध ज्ञान और समझदार फिर भी आपने इसे जाना क्यों नहीं, प्रकृति स्रोत है सकल सुख नाना,  फिर भी क्यों करते खिलवाड़ प्रकृति से, जिससे यह धरा रसातल जाने वाली है। आज यक्ष प्रश्न अब आन पड़ा है, सारा जगत अब निष्प्राण खड़ा है, कैसे  लौटेंगे बहुरंग अब प्रकृति में, क्यों ज्ञान और विज्ञान निर्मित है। ऐ मानव, तुझे देख मुझे यूं लगता है,, जैसे नभ अब अंगार उगलने वाली है। फिर आप कैसे कहते हैं कि यह मानव है, तुम करते हो प्रकृति की रखवाली हो।

व्यथा

चारों ओर से आ रही है पुकार, मृत्यु कर रही है तांडव घर द्वार, सुनी सड़क और गली बाजार, लगता है कि शमशानों में हरनों का अंबर। टूट रहे हैं नयनों के सुंदर सपने, पल में कर्ता हो रहे हैं सब अपने, लगा सारांश अब चिता से तप कर रहा है, नास्तिक लगे अब राम नाम जपिंग। चिल्लपों और चित्कार निराशा, कैसे बचेंगे जन जीवन आशा, कैसे प्रकृति ने खिलकी है पासा, जीव हृदय से मिट रहा प्रकाशा। दीनों के लिए यह रात घनेरी, भई गति सांप छूछूंदर केरी, भूख से आंतें कुलबुल है मेरी त बाहर मौत राह तेक तेरी। अपनी व्यथा मैं व्को सुनाऊं, बच्चों का निवाला I कहां से लाऊं, झूठे वादों को अब मैं कैसे खेलूँ, क्या हे मृत्यु अब तुम्हारे पास पर आ जाऊं।

लोकतंत्र का मजदूर

मेरे चेहरे पर नहीं आता है कभी नूर, रहता हूं हरदम मैं तेरी दुनिया से दूर, बीबी बच्चों की खुशी को रहता हूं मजबूर, हां,साहब मैं हूं इस लोकतंत्र का मजदूर। तेरा और मेरा अलग अलग है रास्ता, तुझे चाहिए मोटे गद्दे और मेरा मेहनत से वास्ता, मैं खुश रहता हूं खाकर सुखी सी रोटी, तुम्हें मुबारक हो बटर,चीज और फल का नाश्ता। हमें निसबत है इन सारी चीजों से हूजूर, हां साहब मैं हूं इस लोकतंत्र का मजदूर। मुझे कभी नहीं सताते ठंड , वर्षा और धूप, नहीं कभी सराह सकूं अपनी प्रिया का रुप, उत्सव होता है मेरे घर आंगन में उस दिन, जिस दिन हरा देता हूं रिपू क्षुधा स्वरुप। अपनी बुलंद नसीबों पर होता हूं मैं मगरुर, हां साहब, मैं हूं इस लोकतंत्र का मजदूर। मेरी इस दीन दशा पर साहब क्यों मुस्काते हो, मेरे ही अथक परिश्रम से तुम सारे सुख पाते हो, देते हैं तुम्हें सारे भौतिक सुख हम अपना , जे इसे स्वयं की चालाकी और हमें मुर्ख बताते हो। अब लगता है तोड़ना चाहिए साहब तेरे सभी गुरुर, हां साहब,मैं हूं इस लोकतंत्र का छोटा सा मजदूर। हां साहब, मैं हूं इस लोकतंत्र का मजदूर।।